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Zulfon Pe Shayari

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Share kro jisse aap baat krte ho or jisse nhi krte…

आह को चाहिये इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होते तक~मिर्ज़ा ग़ालिब


ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, जंज़ीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तारे-वफ़ा, जिन्दां से घबरावेंगे क्या।~मिर्ज़ा ग़ालिब


कैदी तेरी जुल्फों का है आजाद जहां से।
मुझको रिहाई तो सजाओ ने दिलाई।


लिपट के तेरी जुल्फों में बादलों में खो जाना
फिर से तेरी आंखों में डूब के पार हो जाना


तेरी आँखों की नमकीन मस्तियां तेरी हंसी की बेपरवाह गुस्तखीयां
तेरी जुल्फों की लहराती अंगडाईयां नहीं भुलूंगा मैं जब तक है जान…जब तक है जान।

खुदखुशी करने से मुझे कोई परहेज नही है
बस शत॔ ईतनी है कि फंदा तेरी जुल्फों का हो


रूठ कर तेरी जुल्फों से चाँद भी सहम गया ।
दागदार तो था ही बादलों में भी छिप गया।।

Zulfon Pe Shayari

यूँ मिलकर सनम तुमसे रोने को जी चाहता है
तेरी जुल्फों के साए में सोने को जी चाहता है ……!!!


तुझे देखेंगे सितारे तो ज़िया मांगेंगे
प्यासे तेरी जुल्फों से घटा मांगेंगे,,


वो हया सी हँसी ..वो तेरी जुल्फों का चेहरे पर आके तुझे परेशान करना..
वो तेरा अपने होंठो के चाँद को …मेरे माथे पर उकेरना


बिखरने दे तेरी खुशबू
महक जाने दे फिजाओं को,
खुलके बिखरने दे जुल्फों को,
बरस जाने दे घटाओं को
लहरा दे दुपट्टा अपना एक बार
बहक जाने दे हवाओं को


जुल्फों में तेरी पेंच ओ ख़म जितने….
मेरी मजबूरियाँ मेरे मुश्किलात बस इतने


तेरी जुल्फों की छाँव के भी तजुर्बे अजब रहे,
जब-जब किया साया, झुलसता ही रहा हूँ…

जिस हाथ से मैंने तेरी जुल्फों को छुआ था…
छुप छुप के उसी हाथ को मैं चूम रहा हूं… मुशीर झिंझानवी

इजाजत हो तो मैं तस्दीक कर लूँ तेरी जुल्फों से,
सुना है जिन्दगी इक खूबसूरत दाम है साकी। -‘अदम’

हर खुशी माना है ,सनम तेरी जुल्फों के साये में है …
वो मज़ा मगर है कहाँ ,जो दिल के लुट जाने में है .

Zulfon Pe Shayari

तेरी जुल्फों की ज़ंजीर मिल जाती तो अच्छा था
तेरे लबों की वो लकीर मिल जाती तो अच्छा था

सोयेंगे तेरी आँख की खिलवत में किसी रात
साये में तेरी जुल्फों के जागेंगे किसी दिन…

बडे गुस्ताख हैं, झुक कर तेरा चेहरा चूम लेते हैं….
तुमने भी जानम, जालिम ज़ुल्फ़ों को सर चढा रखा है।।

हर “खुश अदा” की “ज़ुल्फ़” में “अटका” हुआ है ~
“दिल” हर “महजबीं” के “हुस्न” पे “कुर्बान” “आँख” है

या दिले दीवाना रुत जागी वस्ले यार की,
झुकी हुई ज़ुल्फ़ में छाई है घटा प्यार की.

तेरी ज़ुल्फ़ क्या संवारी, मेरी किस्मत निखर गयी..
उलझने तमाम मेरी, दो लट में संवर गयी.

ज़ुल्फ़ घटा बन कर रह जाए आँख कँवल हो जाए शायद
उन को पल भर सोचे और ग़ज़ल हो जाए

कुछ और भी हैं काम हमें ऐ ग़म-ए-जाना,
कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे।

दिल उसकी तार-ए-ज़ुल्फ़ में उलझ गया,
सुलझेगा किस तरह से ये बिस्तार है ग़ज़ब।

बिजलिओं ने सीख ली उनके तबस्सुम की अदा,
रंग जुल्फों का चुरा लिया घटा बरसात की।

इधर गेसू उधर रु-ए-मुनव्वर है तसव्वुर में,
कहाँ ये शाम आएगी कहाँ ऐसी सहर होगी।

कम से कम अपने बाल तो
बाँध लिया करो,
कमबख्त बेवजह मौसम
बदल दिया करते हैं।

उसके रुख़्सार पर कहाँ है ज़ुल्फ़,
शोला-ए-हुस्न का धुआँ है ज़ुल्फ़।

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